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नये संकरित बीज और रासायनिक खादों का इस्तेमाल जिस तेज गति से हरित क्रांति के नाम पर हुआ, उतनी ही तेज गति से रोगों का हमला बढ़ता गया | उसे रोकने के लिए तीव्र तीव्रतर और महंगी दवाएं बाजार में आयीं | लेकिन ज्यों-ज्यों दवा दी रोग बढ़ता ही गया | इतना ही नहीं ज्यों-ज्यों कीटाणुओं को मारने के लिए जिन जहरीली दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है | उनका जहर पानी भूमि, वनस्पति, अनाज, साग-सब्जी इनके द्वारा पशु और माँ के दूध में भी आ गया | इसी कारण भुक्त भोगी पश्चिमी जगत के लोग अब बिना रासायनिक खाद-दवा से उगाये खाद्यों को अधिक दाम देकर खरीदने लगे है | इतना ही नहीं अब विश्व में सिन्थेटिक कपडे के बजाय जैविक कपास के कपडे की मांग दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है|

केचुआ खाद के लाभ

1.       वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं को सक्रिय बनाता है. जिससे पौधों को भूमि में मौजूद पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध होते है |

2.       इस खाद से ह्यूमस (जीवांश) की मात्रा बढती है, जिससे मृदा संरचना, जल निकास, वायु संचार तथा जलधारण क्षमता में सुधार होता है |

3.       कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है |

4.       फसल उत्पादन प्रदुषण रहित बनाता है |

5.       फसल एवं लान में खरपतवारों का प्रकोप नहीं होता है |

6.       पौधे, फूल एवं फलों के रंग चमकदार बनते है एवं दाने चमकदार, मोटे व भारी बनते है |

7.       अनाज, फलों एवं सब्जियों के खाद में बढ़ोतरी होती है |

8.       सब्जियों में अधिक उत्पादन व स्वाद से परिपूर्ण उत्पादन देती है |

9.       उत्पादन में वृद्धि होती है |

हमारे मित्र केचुएं

     केचुए जमीनों से प्राप्त पानपत्ती, अधपकी खाद, गोबर कीटको के अवशेष, मरूम मिट्टी खाकर गुजारा करते है | इनकी आंतों में गोसाई नाम के हिस्सों में बाजु जैसे छोटे टुकड़े होते है उनकी सहायता से सेंद्रिय पदार्थों को छोटे अणु में विभाजित किया जाता है | इन अणुओं को पचाकर बचा हिस्सा छोटी गोली नुमा आकार में विष्टा के रूप में बाहर आता है | शहरों में चल रही गौशालाओं के पास प्रचुर गोबर होता है | उनके लिए वजन में कम और गुणों में अधिक संग्रह करने में सुलभ होने में आसान केंचुओं द्वारा खाद तैयार करना अधिक लाभप्रद, कम खर्चीला, कम श्रम और कम जगह मांगने वाला है |

केंचुओं खाद बनाने व उसके पालन की रीति

    सात फिट ऊँचा, 18-20 फिट चौड़ा और आवश्यकतानुसार लम्बाई रखकर शेड़ या छप्पर तैयार करें | उसमें अन्दर प्रवेश करने के लिए और बाहर निकलने के लिये चौड़ाई की दिशा में द्वार रखें. इस छप्पर की प्रवेश और बाहर जाने का रास्ता छोड़कर चारों ओर से घेराबंदी करें | इस छप्पर की चौड़ाई के अनुसार दो फीट चौड़ा रास्ता छोड़कर दोनों बगलों में तीन फीट चौड़ी बेड चार लाइन में बनानी है | इन लइनों में ईंटों के तुकडे (चुरा नहीं) भूमि के समतल में बिछायें. ईंटें के दो टुकड़ों के बीच में पोली जगह रहने दें | केंचुओं को इसमें पनाह मिलेगी |

इन ईंटों के कतारों पर घास, पुआल, गन्ना, केले के पत्ते आदि या अन्य मोटा कचरा दुकडे करके छह इंच ऊंचाई तक बिछायें |

इस कचरे पर अच्छी पकी कंपोस्ट खाद को या बिओगैस की स्लरी की परत डालें | यह अतिरिक्त गर्मी को रोकेगी | फिर अधपकी खाद उस पर डालें | यह केंचुओं के लिये भोजन होगा |

बीज के नाते इन दोनों कतारों पर (दस फीट) लम्बाई के हिसाब से कुल दो हजार केंचुएं सम समान बिखेर दें | उन पर गोमूत्र 1 हिस्सा 10 पानी में मिश्रण करके उसका छिडकाव करें |

उसके ऊपर छह इंच मोटी परत कचरा गोबर का मिलाकर (प्रमाण गोबर 75 प्रतिशत व कचरा 25 प्रतिशत) डालें | अब इसके ऊपर दुबारा 6 इंच कचरा टुकडे करके डालें |

पुराने बोरे पानी में भिगोकर सब बेड़ों पर ढंक दे |

बीच के रास्तों में गोबर कचरा न रहें अन्यथा केंचुए उसे खाने के लिये बाहर आ जायेंगे |

नमी बनी रहे इतना पानी हर दिन छिडकें, गर्मी के दिनों में दिन में दो बार यानी सुबह-शाम पानी का छिडकाव करें | लेकिन कीचड़ न हो इसका भी ध्यान रखें |

6 सप्ताह के भीतर काले रंग का सेंद्रिय खाद बनेगा | हाथ से उठाने पर वह हलका और भुरभुरा (रेत जैसा बिखरे कणों वाला) होगा और केंचुएं ऊपर में रखे गये बोरों से चिपके हुए दिखेंगे |

यह अवस्था प्राप्त होने पर तीन दिन पानी का छिड़काव बंद करें इससे केंचुए नीचे की ओर चले जायेंगे |

उसी जगह तैयार हुए खाद के छोटे ढेर हर दो फीट पर बनावें | जिससे प्रकाश दिखते ही केंचुएं और नीचे ईंटों के टुकड़ों के बीच चले जायेंगे | फिर दो दिनों के बाद यह खाद नीचे बची परत को धक्का न पहुंचाते हुए हाथों से उठाकर छांव में या बोरों में भरकर रखें |

यह खाद उठाने के बाद उसी क्रम से परत दर परत खाद-गोबर-कचरा डालें | इस समय बाहर से केंचुए लाकर डालने की जरुरत नहीं, नीचे गये केंचुएं ऊपर अपना काम शुरू करेंगे |

75 प्रतिशत ताजा गोबर 35 प्रतिशत बारीक़ कचरा छांव में दस दिन रखकर इस्तेमाल करना अच्छा रहता है |

 

केंचुआ खाद

   आयुर्वेद में केंचुआ को ‘गन्दुपाद’ और भूनाग’ नाम से जाना जाता है | हिंदी भाषा में वे ‘केंचुए’ और अंगेजी में ‘अर्थवर्म’ के नाम से जाने जाते है |

 केंचुए जमीन में से प्राप्त पान-पत्ती, अधपकी खाद, गोबर, कीटकों के अवशेष, मुरुम मिट्टी खाकर गुजारा करते है | उनकी आँतों में गीझार्ड नाम के हिस्सों में बाजू जैसे छोटे टुकड़े होते हैं उनकी सहायता से सेंद्रिय पतार्थों को छोटे अनु में विभाजित किया जाता है | इन अणुओं को पचाकर, बचा हिस्सा छोटी गोलीनुमा आकार में विष्ठा के रूप में बाहर आता है | केंचुओं के पेट में चल रही रासायनिक प्रक्रिया के कारण मूलतः सेंद्रिय खाध्य पदार्थों में उपलब्ध नत्र, स्फुरद, पलाश, कैल्शियम एवं अन्य सूक्ष्म तत्व विष्ठा में मिलते है | नत्र की मात्रा सातगुना, स्फुरद 11 गुना और पलाश 13 गुना बढ़ाकर प्राप्त होते है. इसमें विटामिन, ऐन्जाइम्स, एंटी बायोटिक और संजीवकों की प्राप्ति यानि सर्वगुण संपन्न खाद की खदान ही है |

किसान के इस दोस्त द्वारा भूमि के अन्दर छोटे-छोटे बिल बनाकर उसे सच्छिद्र करने से जमीन के अन्दर हवा का प्रवेश और पानी का संग्रह होता है और भूमि स्वस्थ रहती है |

इन बिलों द्वारा पानी का संग्रह भूगर्भ में होने से आवश्यकतानुसार फसल को बह अनायास प्राप्त होकर सिंचाई में बचत होती है | भूगर्भ में बारिश के अतिरिक्त पानी का संग्रह होता है | जिससे भूगर्भ में पानी की सतह ऊपर उठती है और भूगर्भ में स्थित इस पानी में घुले हुए खनिज द्रव्य अनायास फसल को प्राप्त होते है |

भूमि भुरभूरी होने से फसलों की जड़ें चारों ओर फैलती हुई, गहराई तक जाती है, जिससे वनस्पति में अधिक शाखायें, पत्तियाँ, फूल, फल निकल आते है | वह पानपत्ती गलकर उससे केंचुए और अधिक संख्या में बढ़ने लगते है और भूमि दिनों दिन अधिक उर्वरक होती जाती है |

रोग मुक्त, रसीले, चमकीले, टिकाऊ, सुस्वाद, सम आकारवाले और अधिक मात्रा में फल लगते है, अनाज में बढ़ोतरी होती है |

एक ही समय, उसी जगह में आवश्यक पोषकत्व प्राप्त होने से विभिन्न कम्पनियों की  विभिन्न प्रकार की दवायें या खाद देने से बचाव होता है |

एक हेक्टेयर में एक टन केंचुएं और एक टन जीवाणु पांच हार्स पावर के यन्त्र इतनी पलटी जमीन को देते है | वायु मंडल में 80 प्रतिशत नाइट्रोजन की मात्रा है, लेकिन फसल स्वयं उसका लाभ नहीं उठा सकती है | यह जीवाणु भूगर्भ में के खनिज और वातावरण में का नत्र फसल को प्राप्त करा देने का मुक्तिवाहिनी का काम करते है |

भूमि की गहराई में हवा का प्रवेश कराके उसका तापमान सुस्थिर रखने का, साम को रखकर भूमि में क्षार और अम्ल को नियंत्रित करने का काम करते है | वे फसलों को लाभ पहुँचाने वाले जीवाणुओं की संख्या में दसगुना वृद्धि करते है | भूमि का कटाव-क्षरण रोकते है |

खेत में उचित मात्रा में केंचुओं की निर्मिती होने पर और पर्याप्त मात्रा में खरपतवार पानीपत्ती-घासफूस जमीन में उपलब्ध रहने पर बाहर से खाद डालने की जरूरत नहीं होगी |

खाद का रखरखाव और देने का तरीका 

  सावधानी बरतने के बाद भी खाद में कुछ अंडे, केंचुएं आयेंगे. इसलिए इस खाद को छांव में रखकर उसमें नमी बनी रहने के लिए उस पर बीच बीच में पानी का छिडकाव करें.

  केचुओं द्वारा प्राप्त यह खाद बेशकीमती होने से खुश्क खेत में गरमी के दिनों नहीं बिखेरना चाहिए. बोनी के वक्त बीज के साथ बोने से नमीं में उसमे के केंचुएं और अंडे खेत में पलेंगे और खाद में बचत होगी.

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