SPIRITUAL IMPORTANCE
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SPIRITUAL IMPORTANCE

                          सर्वतीर्थमयी मुक्तिदायिनी गोमाता


         सर्वे देवा गवामंगे तीर्थानि तत्पदेषु , तद्गुह्येषु स्वयं लक्ष्मिस्तिष्ठत्येव सदा पितः.

     गोष्पदाक्तमृदा यो हि तिलकं कुरुते नर:, तिर्थस्नातो भवेत् सद्यो जयस्तस्य पदे पदे.

         गावस्तिष्ठान्ति यत्रैव तत्तिर्थं परिकीर्तितं, प्राणास्त्यक्त्वा नरस्तत्र सद्यो मुक्तो भवेद् ध्रुवं .

                                             (ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्रीकृष्णजन्म. २१/ ९१९३ )

   गौ के शरीर में समस्त देवगण निवास करते है और गौ के पैरों में समस्त तीर्थ निवास करते है. गौ के गुह्यभाग में लक्ष्मी सदा रहती है. गौ के पैरों में लगी हुई मिट्टी का तिलक जो मनुष्य अपने मस्तक में लगाता है, वह तत्काल तिर्थजल में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है और उसकी पद-पद पर विजय होती है. जहाँ पर गौए रहती हैं उस स्थान को तीर्थभूमि कहा गया है, ऐसी भूमि में जिस मनुष्य की मृत्यु होती है वह तत्काल मुक्त हो जाता है, यह निश्चित है.

 

 

                     गवां हि तीर्थे वस्तीह गंगा पुष्टिस्तथा तद्रजसि प्रवृद्धा.

                  लक्ष्मी: करीषे प्रणतौ धर्मस्तासां प्रणामं सततं कुर्यात.

                                                                             (विष्णुधर्मोत्तरपु., द्वि. खं. ४२ / ४९ – ५८)

      गौएँ नित्य सुरभिरूपिणी- गौओं की प्रथम उत्पादि का माता एवं कल्याणमयी, पुण्यमयी, सुन्दर श्रेष्ठ गंधवाली हैं. वे गुग्गुल के समान गन्ध से संयुक्त है. गायों पर ही समस्त प्राणियों का समुदाय प्रतिष्ठित है. वे सभी प्रकार के परम कल्याण अर्थात धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की भी सम्पादिका है. गायें समस्त उत्कृष्ट अन्नों के उत्पादन की मूलभूता शक्ति है और वे ही सभी देवताओं के भक्ष्यभूत हविष्यान्न और पुरोडाश आदि की भी सर्वोत्कृष्ट मूल उत्पादिका शक्ति हैं. ये सभी प्राणियों को दर्शन-स्पर्शादि के द्वारा सर्वथा शुद्ध निर्मल एवं निष्पाप कर देती है. वे दुग्ध, दधि तथा घृत आदि अमृतमय पदार्थों का क्षरण करती हैं तथा उनके वत्सादि समर्थ वृषभ बनकर सभी प्रकार के भारी बोझा ढोने और अन्न आदि उत्पादन का भार वहन करने में समर्थ होते है. साथ ही वेदमंत्रों से पवित्रीकृत हविष्यों के द्वारा स्वर्ग में स्थित देवताओं तक को ये ही परितृप्त करती है. ऋषि-मुनियों के यहाँ भी यज्ञों एवं पवित्र अग्निहोत्रादि कार्यों में हवनीय द्रव्यों के लिये गौओं के ही घृत, दुग्ध आदि द्रव्यों का प्रयोग होता रहा है. जहाँ कोई भी शरणदाता नहीं मिलता है वहां विश्व के समस्त प्राणियों के लिये गायें ही सर्वोत्तम शरण-प्रदात्री बन जाती है. पवित्र वस्तुओं में गायें ही सर्वाधिक पवित्र है तथा सभी प्रकार के समस्त मंगलजात पदार्थों की कारणभूता है. गायें स्वर्ग प्राप्त करने की प्रत्यक्ष मार्गभूता सोपान है और वे निश्चित रूप से तथा सदा से ही समस्त धन-समृद्धि की मूलभूत सनातन कारण रही है. लक्ष्मी को अपने शरीर में स्थान देनेवाली गौओं को नमस्कार. सुरभी के कुल में उत्पन्न शुद्ध, सरल एवं सुगन्धियुक्त गौओं को नस्कार. ब्रह्मपुत्री गौओं को नमस्कार. अंतर्बाह्य से सर्वथा पवित्र एवं सुदूर तक समस्त वातावरण को शुद्ध एवं पवित्र करने वाली गौओं को बार-बार नमस्कार.

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